Vayam honored with Keshavsrushti award!

Milind dada’s speech delineating  Vayam’s thought is reproduced here. -rasika

केशवसृष्‍टी पुरस्‍कार यह एक अतिविशिष्‍ट सम्‍मान है. युवावस्‍था में जब सम्‍मान से बल मिलता है, तभी सम्‍मान होना चाहिए. जब नया कुछ करने का बल बचता नही तब किसी पीर पर सम्‍मान की चादरें चढाने से शायद ही समाज का लाभ होता है. हमारे वयम् अभियान का आज आप ने सम्‍मान किया है, वयम् की उम्र मात्र सात वर्ष हैं. मेरे थोडे बाल यहां वहां पक गए है, लेकिन मेरी उम्र यहां मायने नही रखती. यह सम्‍मान हमारे रामदास का है. (रामदास जरा खडे हो जाओ भाई, सब देखें तो सही). रामदास एक बहुत ही छोटे गांव में रहते हैं. अबतक न बिजली है, न सडक है. आप के गांव में राशन नही मिलता था. राशन लेने पहाड चढकर दुकान में जाओ, तो दुकानदार दादागिरी करता था. रामदास ने वयम् के शिबिर में कानून  को समझा, तरकीब समझी. और तहसिलदार के यहां लिखित शिकायत दर्ज की. तहसिलदार हिल गया. दुकानदार हिल गया. रामदास से बोला, भाई चूप कर, तुझे डबल राशन मुफ्त में दे देता हूँ. रामदास नही माना. आखिरकार राशन दुकानदार को पहाड उतरकर नीचे आना पडा, पूरे गांव से माफी मांगनी पडी, और पिछले छः माह का राशन बॅकलॉग भर के देना पडा. रामदास की हिंमत का आज सम्‍मान हो रहा है. यह सम्‍मान हमारे बाबल्‍या काका का है. आप का एक गांव है, जो टिंबर माफिया की दादागिरी से जूझकर अपना जंगल बचा रहा है. टिंबर चोरों ने आजूबाजू को गांवों को इन के खिलाफ भडकाया था. माहौल ऐसा था, कि इन के गांव में बैठक लेकर हम देर रात जब निकलते थे, तो इन का आधे घंटे में फोन आता था – दादा ठीक से पहुंच तो गए ना. हाल ही में आप के गांव का जंगल पर मालिकाना हक शासन ने मान्‍य किया है. 150 हेक्‍टर जंगल के मालिक बने है आप के ग्रामवासी. जंगल में कुल्‍हाडी बंद है, चराई भी एक हिस्‍से में बंद है. गांव मे सुधारित चुल्‍हे है, पचास फीसदी लकडी कम लगती है. जंगल को फेन्सिंग् बनाने के लिए सायबेज आशा ट्रस्ट ने इन की ग्रामसभा को छः लाख रूपये की मदद दी है. वयम् के सालाना बजेट से इन का बजेट जादा है.   यह सम्‍मान हमारे सलीम और शिवा का है. आप के गांव से सभी पुरूष काम की तलाश में हर साल गांव छोड कर बाहर जाते थे. यह युवक वयम् की शिबिर में आकर रोजगार गारंटी कानून सीखकर गए. नोकरशाही की हर तरकीब को मात देकर अपने गांव के लिए रोजगार उपलब्‍ध कराने में आप को सफलता मिली. 100 परिवारोंको लगातार 125 दिन अपने ही गांव में मजदुरी काम मिला. पूरी गर्मी में एक भी परिवार गांव छोडकर नही गया. हम कई बार शहर के मित्रों को हमारा इम्‍पॅक्‍ट पैसे की भाषा में समझाने के लिए इन का उदाहरण देते है. इन युवकों ने वयम् के शिबिर में शुल्‍क के रूप में चालीस रूपिये इन्‍ह्वेस्‍ट किए थे और उस का return-on-investment 100 परिवारों को मिलकर इक्‍कीस लाख रूपये का रोजगार मिला. हमारे यह जादूगर चालीस रूपये को इक्‍कीस लाख में बदलने की ताकत रखते हैं. इसी ताकत का आज सम्‍मान हो रहा है.   यह सम्‍मान हमारे सोमाकाका और विनायक का है. एक महाकाय बांध में विस्‍थापित होने से डुबने से बचाया है इन्‍हों ने छब्‍बीस गांवों को. आप मुंबईकर नही जानते की आप के नाम पर सरकार क्‍या क्‍या कर लेती है. कहते है कि मुंबई की आबादी 2025 में बहुत बढेगी, और तब पानी भी हर व्‍यक्‍ती को आज से दुगना लगेगा. अब पता नही नहाने के लिए दुगना लगेगा, या और कुछ धोने के लिए दुगना लगेगा. खैर सरकार को ऐसा लगता है कि 12 नये बडे बांध बनाए बिना यह समस्‍या नही छूटेगी. 2007 से मुंबई में हर नई ईमारत पर rainwater harvesting करना अनिवार्य है. इस का पालन मुंबई नही करती. मुंबई के कमिशनर आजतक हमें RTI में यह बता नही पाये है कि कितने लिटर पानी मुंबई की छतोंपर संवारा जाता है. क्‍यों? कॉट्रॅक्‍टरों और मंत्री संत्रीयों को जिस से पैसा मिलता है वही विकास होता है. कहते हैं, all development is byproduct of corruption! इस लिए यह सब rainwater harvesting वगैरह फालतू चीजों को छोड कर रिव्‍हर लिंक अर्थात् नदी जोड करने में सरकार आप का पैसा बरबाद करने पर तुली है. और ये नदीजोड वाले बांध बनेंगे तो सोमाकाका, विनायक, और इनमे से कईयों के गांव डुबेंगे, खेत और जंगल भी नष्‍ट हो जायेंगे. जिन को खेती के सिवा दुसरा कौशल नही है, जिनका पेटपानी जंगल की चीजों पर चलता है, उन्‍हे कितना भी पैसा दोगे तो बिना जमीन के पेट कैसे पालेंगे? इसीलिए पेसा कानून कहता है कि ग्रामसभा को पूछे बिना कोई भी जमीन सरकार नही हडप सकती. भूमि अधिग्रहण कानून (धारा 41) कहता है कि जब भी दुसरा कोई पर्याय है तब अनुसूचित या आदिवासी क्षेत्र की जमीन का अधिग्रहण नही किया जाएगा. बस् इसी कानून का प्रयोग कर इन गांव के लोगों ने बांध को रोक रखा है. कुछ लोग कहते हैं, हम विकास का विरोध करते हैं. हमारे एक कार्यकर्ता बोपजी कहते है, मुंबई वालों का लगता है wrong number लगा है, जमीन उन के बाप की नही, हमारे बाप की है. मुंबई के लोग कोई दुश्‍मन नही है हमारे. हमारे ही भाई बहन है. उन को पानी कम पडता हो तो हम से दोस्‍ती में कहे. लात मारकर भगा देने की विस्‍थापन की भाषा तो भाई भाई के बीच शोभा नही देती. हमारी जमीन और उनका पैसा ऐसी साझेदारी भी तो हो सकती है. बांध के मालिक हम बनेंगे, मुंबई को पानी उचित दाम में बेचेंगे. वैसे भी चितले समिती ने कह दिया है water is an economic good और महाराष्‍ट्र जल‍संपदा नियमन प्राधिकरण भी बैठा है पानी के मालिकाना हक बेचने के लिए. जब धंदा ही करना है, तो हम भी करेंगे. फटे अधूरे कपडे पहना यह समाज मुठ्ठीभर अनाज पर जी कर पहाड फोड सकता है, नदिया को बहा सकता है, और मुंबई जैसी लक्ष्‍मीकन्‍या को चुनौती भी दे सकता है. इसी सिंह साहस का यह सम्‍मान है. आप ने सुना होगा कि वयम् आदिवासी वनवासी क्षेत्र में काम करती है. सच है कि हमने शुरुआत वहां से की है, क्‍यों की हिंमतवाले लोगों के बीच ऐसे काम करना आसान होता है. लेकिन वयम् के ध्‍येय में किसी क्षेत्र की या समाज विशेष की मर्यादा नही है. हमारे चिपलून के कार्यकर्ता संदीप पवार भी आज यहां है, वहां कोई आदिवासी जनजाति नही है. उन के गांव में बौध्‍द है, कुणबी है, ब्राह्मण है – सारे इस काम में उन के साथ है. अपने गांव की ग्रामसभा को प्रभावी बनाने में यह जुटे हैं. हमारे चारकोप के कार्यकर्ता सदानंद खानोलकर यहां है – अपने वार्ड में अॅडव्‍हान्‍स्‍ड लोकॅलिटी मॅनेजमेंट कमिटी बनाकर महानगरपालिका से अच्‍छे काम करवा रहे हैं. हमारी पुणे हिंजवडी की कार्यकर्ता संजीवनी महाजन है. बिना कोई मोर्चा या बैनरबाजी किए हिंजवडी के ट्रॅफिक की समस्‍या संजीवनी ने सुलझाई है. वयम् का मंत्र कहीं भी चल जाता है, बस् मंत्र का प्रयोग करने वालेका जनतंत्र में विश्‍वास होना चाहिए. हमारा ध्‍येयवाक्‍य है – अपने विकास का अपना अभियान. जिस को भी लगता है विकास अपना है, अपने हाथों से अपने विचार से विकास हो, उन सब का यह अभियान है. रामदास स्‍वामी के शब्‍दों में थोडा बदल कर हमारी शर्त इतनी ही है, सामर्थ्‍य आहे चळवळीचे जो जो करील तयाचे परंतु तेथे लोकशाहीचे अधिष्‍ठान पाहिजे. हमारा जनतंत्र ही हमारा मूलाधार है. डा. आंबेडकर ने संविधान को देश के सम्मुख रखते हुए कहा था – अब तो सत्‍याग्रह करने की भी आवश्‍यकता नही होनी चाहिए, क्‍यूंकी अब हम ही हमारे कानून बनाएंगे, कानून से ही सब की हितरक्षा होनी चाहिए. वयम् की गंगधार यहीं से शुरू होती है. हमारे पिढी का भाग्‍य है पिछले कई वर्षों में ऐसे कानून बने हैं जो वास्‍तव में जनतंत्र को मजबूत कर रहे हैं. उंगली पर स्‍याही लगाकर सेल्‍फी निकालना – इतना मर्यादित जनतंत्र अब नही है. सूचना अधिकार कानून है, दफ्तर देरी कानून है, ग्राहक रक्षा कानून है, पंचायत राज है, ऐसे कई हैं – जो एक सामान्‍य नागरिक को बल देते हैं और शासन को उत्‍तरदायी, जवाबदेही बनाते हैं. Responsible people and responsive government (अर्थात् जागृत नागरिक और जवाबदेह सरकार) इसी को लोकशाही कहते हैं. शुरू शुरू में लोग हमें पूछते थे, आप लोग कानून के आधार पर काम करते हो, आप में से वकील कौन है? कोई नही है. थोडे कम पढे लिखे, और वह भी मराठी मीडियम में, जिन को अपने तहसिल से बाहर की दुनिया बहुत कम मालूम है – ऐसे सामान्‍य लोग भी जब कानून का प्रयोग कर सकते हैं – तो आप सब क्‍यों नही? देश में कानून का राज होने की अपेक्षा अगर हम करते हैं, तो फिर कानून को सामान्‍य जनता से दूर रखकर कैसे चलेगा? कानून को सब ने समझना चाहिए. दुसरी बात जनतंत्र बॅलन्‍स से चलता है. किसी एक के हाथ में बहुत अधिक सत्‍ता केंद्रीत हो, तो जनतंत्र खतरे में आ जाता है. सत्‍ता विकेंद्रीत हो और एकदुसरे पर नियंत्रण हो तो जनतंत्र ठीक से चलता है. इसी लिए वयम् का आग्रह रहता है कि ग्रामसभा सशक्‍त हो, महानगरों मे वार्ड सभा सशक्‍त हो. लोग प्रश्‍न पूछने के आदी हो, शासन जवाब देने की आदत डालें. हम बचपन में गीत गाते थे, ‘समन्‍वयाने नम्रपणाने विद्रोहाला शमवूया’. हम इसी को प्रत्‍यक्ष में लाने की कोशिश करते हैं. रोजगार गारंटी का काम लेने में, RTI से जानकारी निकालने में, सोशल ऑडिट का आग्रह करने में – कई बार शासकीय अधिकारीओं से संघर्ष के प्रसंग आते हैं. हमारी कोशिश यह रहती है कि उनका व्‍यक्तिगत अपमान हम से ना हो. हम हमारी बात न छोडें, लेकिन सभ्‍यता भी न छोडें. धीरे धीरे अधिकारीओं से मित्रता का भाव बढें. हमारे कुछ नए कार्यकर्ता बडे चाव से अपने घर वालों बताते हैं, पहले जो हमारी ओर मूंह उठाकर देखते भी न थे, वही तहसिलदार अब ‘आईए बैठिए’ कहते हैं. हमारा उसूल है, हम किसी को साहब नही कहते. हम मानते हैं कि साहब तो 1947 में देश छोडकर गए हैं. अब भी किसी को लगता है, कि वो साहब है तो जाने के दरवाजे खुले है. अब कोई साहब नही है, हम सब बराबरी के हैं, भाईबहन हैं, तो फिर किसीसे दबना डरना क्‍यों? हम शासन के अधिकारीओं को भी भाऊ, दादा, या जी लगाकर संबोधित करते हैं. छोटी सी बात है, लेकिन जनतंत्र के लिए आवश्‍यक बॅलन्‍स की शुरूआत कर देती है. हमने जलकुंड का प्रयोग किया, हमारे जिला परिषद के तब के सीइओ ने पुरी शासन यंत्रणा में उस का प्रचार किया. यहां तक की, नरेगा कमिशनर इसे शासन की योजना बनाएं इस लिए भी उनका प्रयास रहा. हमने वन व्‍यवस्‍थापन में लोकसहभाग के कुछ अच्‍छे प्रयोग किए, वनविभाग के अनेक बडे अधिकारीओं ने हमारे प्रसार में मदद की है. अभी एक बडी कॉपोरेट बँक को CSR में जंगल बढाने के लिए कोई प्रॉजेक्‍ट करना था, उन्‍हे वनविभाग ने वयम् की शिफारिश की है. 40हजार पेड लगाने का वृक्षवल्‍ली सोयरीक अभियान अब शुरू हो गया है. नरेगा में जनसहभाग से नियोजन का आयपीपीई कार्यक्रम अभी शासन चला रहा है. विक्रमगड व जव्‍हार दोनों तहसिलदार तथा बीडीओ ने वयम् के कार्यकर्ताओं को उस मे resource person के रूप में निमंत्रित किया है. यह सारे उदाहरण हम इसलिए बताते हैं कि जनतंत्र में बॅलन्‍स – जनता व शासन दोनों के लिए लाभदायक होता है.
परमात्‍म तत्‍व का अंश हम सब में है. यह सारे अंश मिलाकर ही खलनिर्दालन करने वाले का पूर्णवतार हो सकता है. ‘वयम्’ का अर्थ है हम सब.  भगवान सर्वव्यापी है, लेकिन उन्हे समझने के लिए किसी पत्थर पर सिंदूर थापते है. वैसा ही पत्थर बनने का मॊका मेरे शरीर को मिला है, निमित्त बनने का भाग्य मिला है. लेकिन वयम् का भाव हम सब में हैं. पुरस्कार हम सब का है.
धन्यवाद.

– मिलिंद Milind
Organizer, Vayam (वयम् – आपल्या विकासाची आपली चळवळ)
Jawhar, Dist. Palghar | Phones: +91.8879.330.774 and +91.9421.564.3301 34

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3 thoughts on “Vayam honored with Keshavsrushti award!

  1. बाहेरगांवी असल्याने कार्यक्रमाला हजर राहू शकलो नाही पण वृतांत वाचून ते समाधान मिळाले.

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